कोरोना में सोशल डिस्टेंसिंग तो समझ आती है पर लगातार बढ़ रही ईमोशनल डिस्टेंसिंग का क्या करे?​ -प्रो. गायत्री तिवारी

कोरोना में सोशल  डिस्टेंसिंग तो समझ आती है पर लगातार बढ़ रही ईमोशनल डिस्टेंसिंग का क्या करे?​ -प्रो. गायत्री तिवारी
कोरोना में सोशल डिस्टेंसिंग तो समझ आती है पर लगातार बढ़ रही ईमोशनल डिस्टेंसिंग का क्या करे?​ -प्रो. गायत्री तिवारी
कोरोना में सोशल डिस्टेंसिंग तो समझ आती है पर लगातार बढ़ रही ईमोशनल डिस्टेंसिंग का क्या करे?

Social Distancing V/s Emotional Distancing



दूरियों का अहसास तब हुआ जब मैने कहा की ठीक हूँ और उसने मान लिया---
फासले/ दूरियां ऐसे अल्फाज़ हैं जिनके मायने बड़े ही गहरे हैं,इनकी चोट दिखाई नहीं देती पर महसूस होती है बड़ी दूर तक. आपको याद होगा स्कूल के दिनों में प्रार्थना के बाद पी .टी .का पीरियड हुआ करता था,उस समय टीचर लाइन बनवाते समय ये हिदायत दिया करते थे की एक हाथ की दूरी पर खड़े हो जाओ.मकसद ये होता था की दूर से भी सब पर नज़र रखी जा सके.दूरियां ज़रूरी भी हैं .जैसा की आज कल सब ओर सोशल डिस्टैन्सिंग का बोलबाला है,काफी हद तक सही भी है हमारी सेहत के लिहाज़ से.फासले अच्छे भी हुआ करते हैं,-----
मेरा वज़ूद पता करना हो तुम्हारी ज़िंदगी में,तो मुझसे दूर जाकर देखो,(शायद इसी लिए पुराने समय में सावन के दिनों में बहनें पीहर जाया करती थी और कुछ ही दिनों में सबको उनकी अहमियत पता चल जाती थी.)
खैर छोड़िये ,हम बात करते हैं इमोशनल डिस्टैन्सिंग की ,जो काफी आम है.हम भी उसकी चपेट में आ ही जाते हैं या दूसरों को भी चपेट में ले ही लेते हैं .इसका सबसे सरल उदाहरण है बचपन कच्ची में या कुट्टी करना. आप ही सोचिये अपने हाथ की छोटी सी ऊँगली को ऊपर उठा कर ये एलान करना की बस, अब बातचीत बंद और सामने वाला प्राणी बेचारा पक्की की जुगत में लग जाता. वैसे वो ज़माना ठीक था जहाँ सुलह भी दो उँगलियों के आपसी स्पर्श से हो जाया करती थी.तकलीफ तो बड़े हो कर होती है जहाँ सरेआम ऐसा कोई एलान नहीं किया जाता और हरकतों से ,हावभाव से आपको ही महसूस करना पड़ता है की अमुक व्यक्ति द्वारा आप भावनात्मक तौर पर नकारे जा रहे हो. बड़ी तकलीफ होती है. परिवार में ,समाज में ,नौकरी पर ---ये किस्से आम हैं .इनका मूल कारण है गलतफहमियां ---
ग़लतफ़हमी से बढ़कर दुश्मन कोई दूसरा नहीं कोई परिंदों को उड़ाना हो तो बस शाखें हिला दीजिये. कारण पता हो तो निवारण करे कोई. इन मसलों पर सबसे ज़्यादा दुःख पहुँचता है जब ये एक ही घर में रहने वालों के बीच हों. आप ही सोचिये ज़रा,पहले ही परिवार सिकुड़ते जा रहे हैं, उसपर ये अबोलापन और तकलीफ देता है.---
दूरियां बढ़ी ,तो इतनी बढ़ गईं, की फिर तो उसने वो भी सुना जो मैने कहा भी नहीं. इसमें सुखी कोई नहीं रहता,तनाव और दबाव किसी को भाता है भला?लेकिन --अहम् ---मैं ही क्यों झुकूं? फिर भी, वो इंसान जो रिश्तों को जानता,पहचानता और मानता है ,उसे खोने नहीं देना चाहता वो झुकता चला जाता है, उनके लिए किसी ने ये कहा है की....
रिश्ते निभाने के लिए झुकना है तो खूब झुको, पर हर बार आप ही को झुकना पड़े तो फिर रुको. देखिये फ़िज़ूल की बातों से दूरियां बढ़ती चली जाती हैं,
खिंचाव बढ़ता चला जाता है फिर टूटने की नौबत आ जाती है, शुरू में ही संभल जायें.एक छोटे से घर में इतनी अनदेखी दीवारें न खेंचें बल्कि पुल बनाएं,लोग तो आप पर पत्थर फेंकेंगे ,अब ये आप पर है की दीवार बनाते हो या सेतु.--नयी पीढ़ी को अच्छी धरोहर सौंपना अपनी ज़िम्मेदारी है,आज ही से भागीदारी सुनिश्चित करें....


शुभेच्छा सहित

प्रो.गायत्री तिवारी

Pro Dr. Gaytri Tiwari

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